Sanskrit
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन |
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः
Transliteration
nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana .
pāpamevāśrayedasmānhatvaitānātatāyinaḥ
Translation
O Janardana, what happiness shall we derive by killing the sons of Dhrtarastra? Sin alone will accrue to us by killing these felons.
Word Meanings
निहत्य — having slain; धार्तराष्ट्रान् — sons of Dhritarashtra; नः — to us; का — what; प्रीतिः — pleasure; स्यात् — may be; जनार्दन — O Janardana; पापम् — sin; एव — only; आश्रयेत् — would take hold; अस्मान् — to us; हत्वा — having killed; एतान् — these; आततायिनः — felons.
Explanation
Janardana means one who is worshipped by all for prosperity and salvation — Krishna.He who sets fire to the house of another? who gives poision? who runs with sword to kill? who has plundered wealth and lands? and who has taken hold of the wife of somody else is an atatayi. Duryodhana had done all these evil actions.
Translation (Hindi)
।।1.36।।हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों की हत्या करके हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें केवल पाप ही लगेगा।
Explanation (Hindi)
।।1.36।। अर्जुन के इतना कुछ कहने पर भी भगवान् श्रीकृष्ण मूर्तिवत् मौन ही रहते हैं। इसलिये वह पहले की भाषा छोड़कर मृदुभाव से किसी मन्द बुद्धि मित्र को कोई बात समझाने की शैली में भावुक तर्क देने लगता है। भगवान् के निरन्तर मौन धारण किये रहने से अर्जुन की यह परिवर्तित नीति अत्यन्त हास्यास्पद प्रतीत होती है।इस श्लोक में प्रथम वह कहता है कि दुर्योधनादि को मारने से किसी प्रकार का कल्याण होने वाला नहीं है। इस पर भी काष्ठवत् मौन खड़े श्रीकृष्ण को देखकर उसको इस मौन भाव का कारण समझ में नहीं आता। शीघ्र ही उसे स्मरण हो आता है कि कौरव परिवार आततायी है और धर्मशास्त्र के नियमानुसार आततायी को तत्काल मार डालना चाहिये चाहे वह शिक्षक वृद्ध पुरुष या वेदज्ञ ब्राह्मण ही क्यों न हो। आततायी को मारने में किसी प्रकार का पाप नहीं है। अन्यायपूर्वक किसी पर आक्रमण करने वाला पुरुष आततायी कहलाता है।अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप के विपरीत हम जो गलत काम करते हैं वे पाप कहलाते हैं। शरीर मन और बुद्धि को ही अपना स्वरूप समझकर कोई कर्म करना श्रेष्ठ मनुष्य का लक्षण नहीं है। अहंकारपूर्वक स्वार्थ के लिये किये गये कर्म हमारे और शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा के बीच वासना की सुदृढ़ दीवार खड़ी कर देते हैं। इन्हें ही पाप कहा जाता है।शत्रुओं की हत्या करने में अर्जुन का अविवेकपूर्ण विरोध शास्त्र को न समझने का परिणाम है और फिर अपनी समझ के अनुसार कर्म करना अपनी संस्कृति को ही नष्ट करना है।इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के तर्कों की न स्तुति करते हैं और न ही आलोचना। वे जानते हैं कि अर्जुन को अपने मन की बात कह लेने देनी चाहिए। किसी मानसिक रोगी के लिए यह उत्तम निदान है। इस प्रकार उसका चित्त शांत हो जाता है।
Word Meanings (Hindi)
।।1.36।। अर्जुन के इतना कुछ कहने पर भी भगवान् श्रीकृष्ण मूर्तिवत् मौन ही रहते हैं। इसलिये वह पहले की भाषा छोड़कर मृदुभाव से किसी मन्द बुद्धि मित्र को कोई बात समझाने की शैली में भावुक तर्क देने लगता है। भगवान् के निरन्तर मौन धारण किये रहने से अर्जुन की यह परिवर्तित नीति अत्यन्त हास्यास्पद प्रतीत होती है।इस श्लोक में प्रथम वह कहता है कि दुर्योधनादि को मारने से किसी प्रकार का कल्याण होने वाला नहीं है। इस पर भी काष्ठवत् मौन खड़े श्रीकृष्ण को देखकर उसको इस मौन भाव का कारण समझ में नहीं आता। शीघ्र ही उ
Written by
Aditya Gupta
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