अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च | तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन
aprakāśo.apravṛttiśca pramādo moha eva ca . tamasyetāni jāyante vivṛddhe kurunandana
O descendant of the Kuru dynasty, when tamas predominates these surely [i.e. without exception.-M.S.] come into being: non-discrimination and inactivity, inadvertence and delusion.
हे कुरुनन्दन ! तमोगुण के प्रवृद्ध होने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये सब उत्पन्न होते हैं।।
When Tamas increases? darkness? a desire to do nothing? forgetfulness of ones duties and confusion ome into existence.Darkness Absence of discrimination.Apravritti Inertness extreme inactivity.Pramada (heedlessness) and Moha (delusion) are the effects of darkness. These are the characteristics or marks which indicate that Tamas is predominant. Tamas is a great stumbling block to spiritual progress and success in any walk of life. It must be destroyed at all costs. People mistake Tamas for Sattva or Santi (peace). They take the Tamasic man for a silent Yogi All is Prarabdha Everything is Maya There is no world Why should I work Work will bind me. I am Brahman. This is not spirituality but pure and thick Tamas.
यदि कोई साधक अपने में इस श्लोक में कथित लक्षणों को पाये? तो उसे समझना चाहिये कि वह तमोगुण से पीड़ित है। अप्रकाश का अर्थ बुद्धि की उस स्थिति से है? जिसमें वह किसी भी निर्णय को लेने में स्वयं को असमर्थ पाती है। इस स्थिति को लैकिक भाषा में ऊँघना कहते हैं? जिसके प्रभाव से मनुष्य की बुद्धि को सत्य और असत्य का विवेक करना सर्वथा असंभव हो जाता है? हम सबको प्रतिदिन इस स्थिति का अनुभव होता है? जब रात्रि के समय हम निद्रा से अभिभूत हो जाते हैं।अप्रवृत्ति सब प्रकार के उत्तरदायित्वों से बचने या भागने की प्रवृत्ति? किसी भी कार्य को करने में स्वयं को अक्षम अनुभव करना तथा जगत् में किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न और उत्साह का न होना ये सब अप्रवृत्ति शब्द से सूचित किये गये हैं। तमोगुण के प्रबल होने पर सब महत्वाकांक्षाएं क्षीण हो जाती हैं। मनुष्य की शक्ति सुप्त हो जाने पर मात्र भोजन और शयन? ये दो ही उसके जीवन के प्रमुख कार्य रह जाते हैं।इन सबके परिणामस्वरूप वह अत्यन्त प्रमादशील हो जाता है। उसे अपने अन्तरतम का आह्वान भी सुनाई नहीं देता। और वस्तुत? वह रावण के समान अत्याचारी भी नहीं बन सकता है। क्योंकि दुष्ट बनने के लिए भी अत्यधिक उत्साह और अथक क्रियाशीलता की आवश्यकता होती है।शुभ और अशुभ इन दोनों प्रकार के कार्यों को करने में असमर्थ होकर वह शनै शनै मोह के गर्त में गिरता जाता है। वह जगत् का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करता है और जीवन में अपनी संभावनाओं का विपरीत अर्थ लगाता है? तथा अपने व्यावहारिक सम्बन्धों को निश्चित करनें में भी सदैव त्रुटि करता है। इस प्रकार जो पुरुष न अपने को? न जगत् को और न अपने सम्बन्धों को ही समझ पाया है? उसका जीवन एक भ्रम है और उसका अस्तित्व ही एक भारी भूल है।इस प्रकार? मन पर पड़ने वाले इन तीनों गुणों के प्रभावों का वर्णन करने के पश्चात्? गीताचार्य हमें बोध कराना चाहते हैं कि इन गुणों का प्रभाव केवल किसी एक देह विशेष में जीवित रहते हुये ही नहीं होता है। मन की ये प्रवृत्तियाँ जिन्हें हम इस जीवन में उत्पन्न कर विकसित करते हैं और उनका अनुसरण कर उन्हें शक्तिशाली बनाते हैं? जीव के मरण के पश्चात् उसकी गति और स्थिति को भी निर्धारित करती हैं।वेदान्त दर्शन के अतिरिक्त तत्त्वज्ञान की किसी भी अन्य शाखा में मरणोपरान्त जीवन के विषय में सम्पूर्ण रूप से विचार नहीं किया गया है। इस विषय में अन्य सभी धर्ममतों द्वारा दिये गये विभिन्न स्पष्टीकरण हैं? तथापि मरण के पश्चात् जीवन के अस्तित्व में किसी को भी अविश्वास नहीं है। अन्य मतों में जीव की गति के विषय में धार्मिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त केवल हठवादी घोषणायें हैं? किन्तु दर्शनशास्त्र का रूप देने योग्य युक्तियुक्त विवेचन नहीं है।इसके पूर्व भी गीता में पुनर्जन्म के विषय में विस्तृत विवेचन किया गया था। सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से सर्वथा वियोग ही मृत्यु कहलाता है। इसलिये? मृत्यु स्थूल शरीर का प्रारब्ध है। वह सूक्ष्म शरीर के अभिमानी नित्य विद्यमान जीव का दुखान्त नहीं है। एक देह विशेष में अपने प्रयोजन के सिद्ध हो जाने पर जीव उस देह को त्यागकर चला जाता है। वृत्तिरूप मन और बुद्धि ही सूक्ष्म शरीर कहलाती है। एक देह विशेष को धारण किये हुए जीवन में भी अन्तकरण के विचार ही व्यक्ति के कर्मों के स्वरूप का निर्धारण करते हैं। इसलिए? हिन्दू तत्त्वचिन्तकों का यह निष्कर्ष युक्तिसंगत है कि मरण के पश्चात् भी? जीव वर्तमान जीवन के विचारों के संयुक्त परिणाम की दिशा में ही गमन करता है।जब किसी व्यक्ति का स्थानान्तरण होता है? तब वह बैंक में जाकर अपनी उस धनराशि को प्राप्त कर सकता है? जो उस समय उसके नाम पर शेष जमा होती है? न कि भूतकाल में उसके द्वारा जमा की गई कुल राशि। इसी प्रकार? जीवन में किये गये शुभाशुभ विचारों और कर्मों के संयुक्त परिणाम के द्वारा ही मरण के समय हमारे विचारों के गुण और दिशा निर्धारित किये जाते हैं।हम यह पहले ही देख चुके हैं कि हमारे विचारों के स्वरूप पर सत्त्व? रज और तमोगुण का प्रभाव पड़ता है। इसलिये मनुष्य के अपने जीवन काल में जिस गुण का प्राधान्य रहता है उसी के द्वारा देह त्याग के पश्चात् की उस मनुष्य की गति होनी चाहिये यह सर्वथा युक्तिसंगत है। इस अध्याय के निम्न प्रकरण में इन्हीं संभावनाओं का वर्णन किया गया है।भगवान् कहते है