ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः
ye yathā māṃ prapadyante tāṃstathaiva bhajāmyaham . mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ
According to the manner in which they approach Me, I favour them in that very manner. O son of Partha, human beings follow My path in every way.
जो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ; हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं।।
I reward men by bestowing on them the objects they desire in accordance with their ways and the motives with which they seek Me. If anyone worships Me with selfish motives I grant him the objects he desires. If he worships Me unselfishly for attaining knowledge of the Self? I grant him Moksha or final liberation. I am not at all partial to anyone. (Cf.VII.21andIX.23).
भगवान् में राग द्वेष आदि की दुर्बलताओं का आरोप उचित नहीं है। वे तो शक्तिपुञ्ज हैं जो समस्त कर्मों एवं उपलब्धियों का मूल है। उस ईश्वर की शक्ति का आह्वान करने के लिये हमें उपाधियाँ दी गयी हैं। बुद्धिमत्ता पूर्वक यदि इन उपाधियों का तथा शक्ति का हम उपयोग करें तो निश्चय ही लक्ष्य को पा सकते हैं अन्यथा वही शक्ति हमारे नाश का कारण बन सकती है।यन्त्रों की सहायता से पेट्रोल की ईन्धन शक्ति को अश्वशक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है। उस परिवर्तित शक्ति का उपयोग करके वाहन द्वारा हम अपने गन्तव्य तक पहुँच सकते हैं अथवा किसी वृक्ष आदि से टक्कर मारकर अपनी हड्डियाँ भी चूरचूर कर सकते हैं इस प्रकार की दुर्घटनायें वाहन चालकों की असावधानी के कारण होती हैं। यद्यपि जिस वेग से वाहन टकराया उस वेग को उसने पेट्रोल से ही प्राप्त किया था। हम यह नहीं कह सकते कि जो लोग लक्ष्य तक पहुँच गये उनके प्रति पेट्रोल को राग था और दुर्घटनाग्रस्त लोगों से द्वेष। बिना किसी पक्षपात के पेट्रोल अपनी शक्ति प्रदान करता है परन्तु यन्त्रों द्वारा उसका सदुपयोग अथवा दुरुपयोग करना हमारी अपनी बुद्धि पर निर्भर करता है। यही बात विद्युत् शक्ति के सम्बन्ध में भी समझनी चाहिये। विद्युत् की अभिव्यक्ति विभिन्न उपकरणों में विभिन्न प्रकार से होती है वह उन सब उपकरणों का गुण धर्म है और न कि विद्युत शक्ति का।इसी प्रकार भगवान् यहाँ कहते हैं जो मुझे जैसा भजते हैं मैं उन पर वैसी ही कृपा करता हूँ। जिस रूप में हम ईश्वर का आह्वान करेंगे उसी रूप में वे हमारी इच्छा को पूर्ण करेंगे।यदि भगवान् पक्षपातादि अवगुणों से सर्वथा मुक्त हैं तो उनकी कृपा सब पर एक समान ही होगी फिर सामान्य मनुष्य भगवान् की शरण में न जाकर अन्य विषयों की ही क्यों इच्छा करते हैं इस प्रश्न का उत्तर है