सञ्जय उवाच | इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः | आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा
sañjaya uvāca . ityarjunaṃ vāsudevastathoktvā svakaṃ rūpaṃ darśayāmāsa bhūyaḥ . āśvāsayāmāsa ca bhītamenaṃ bhūtvā punaḥ saumyavapurmahātmā
Sanjaya said Thus, having spoken to Arjuna in that manner, Vasudeva showed His own form again. And He, the exalted One, reassured this terrified one by again becoming serene in form.
संजय ने कहा -- भगवान् वासुदेव ने अर्जुन से इस प्रकार कहकर, पुन: अपने (पूर्व) रूप को दर्शाया, और फिर, सौम्यरूप महात्मा श्रीकृष्ण ने इस भयभीत अर्जुन को आश्वस्त किया।।
His own form His form as the son of Vasudeva.
यहाँ संजय अन्ध वृद्ध राजा से इस बात की पुष्टि करता है कि भगवान् ने अपने दिये हुए वचन के अनुसार पुन सौम्य रूप को धारण किया। वासुदेव शब्द से यह स्पष्ट करते हैं कि पूर्व का रूप कौन सा था वह रूप जिसमें श्रीकृष्ण ने वसुदेव के घर जन्म लिया था। भगवान् ने पुन? अर्जुन के परिचित मित्र और गोपियों के घनश्याम कृष्ण का सौम्य और प्रिय रूप धारण किया। भयभीत अर्जुन को वे मधुर वचनों से आश्वस्त करते हैं।यहाँ फिर एक बार हम संजय के शब्दों में उसकी व्याकुलता देखते हैं। वह चाहता है कि धृतराष्ट्र यह देखें कि श्रीकृष्ण ही विश्वेश्वर हैं और वे पाण्डवों के साथ हैं। किन्तु कैसे क्या कभी एक अन्धा व्यक्ति देख सकता हैफिर रणभूमि का दृश्य है। संजय अर्जुन के शब्दों में सूचित करता है कि