यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः | यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये
yadakṣaraṃ vedavido vadanti viśanti yadyatayo vītarāgāḥ . yadicchanto brahmacaryaṃ caranti tatte padaṃ saṃgraheṇa pravakṣye
I shall speak to you briefly of that immutable Goal which the knowers of the Vedas declare, into which enter the deligent ones free from attachment, and aspiring for which people practise celibacy.
वेद के जानने वाले विद्वान जिसे अक्षर कहते हैं; रागरहित यत्नशील पुरुष जिसमें प्रवेश करते हैं; जिसकी इच्छा से (साधक गण) ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं - उस पद (लक्ष्य) को मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।।
The Supreme Being which is symbolised by the sacred monosyllable Om or the Pranava is the highest step or the supreme goal of man.The same ideas are expressed in the Kathopanishad. Yama (the God of Death) said to Nachiketas? The goal which all the Vedas speak of? which all penances proclaim and wishing for which they lead the life of celibacy? that goal (world) I will briefly tell thee. It is Om. Satyakama the son of Sibi estioned Pippalada? O Bhagavan? if some one among men meditates here until death on the syllable Om? what world does he obtain by that Pippalada replied? O Satyakama? the syllable Om is indeed the higher and the lower Brahman. He who meditates on the higher Purusha with this syllable Om of three Matras (units) is led up by the Samaverses to the Brahmaloka or the world of Brahma. (Prasnopanishad)Pranava or Om is considered either as an expression of the Supreme Self or Its symbol like anidol (Pratika). It serves persons of dull and middling intellects as a means for realising the Supreme Self.Chant Om three times at the commencement of your meditation you will find concentration of mind easier.
इस श्लोक में जो कि एक प्रसिद्ध उपनिषद् के मन्त्र का स्मरण कराता है भगवान् श्रीकृष्ण लक्ष्य की स्तुति करते हुए वचन देते हैं कि वे अगले श्लोकों में पूर्णत्व के परम लक्ष्य तथा तत्प्राप्ति के उपायों का वर्णन करेंगे।ध्यानसाधना में पूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए मन की योग्यता अत्यावश्यक होती है। इस योग्यता के सम्पादन के लिए प्रायः सभी उपनिषदों में प्रणवोपासना (ओंकारोपासना) का अनेक स्थानों पर उपदेश दिया गया है। पौराणिक युग से इस उपासना का स्थान श्रद्धाभक्तिपूर्वक किये जाने वाले ईश्वर के साकार रूप या अवतारों के ध्यान पूजा आदि ने ले लिया है। इस प्रकार के ध्यान का प्रयोजन और उपयोगिता वही है जो वैदिक उपासनाओं की है।यहाँ साधक को अनेक प्रकार के प्रतिबन्धों की सूचनाओं और आवश्यक सावधानियों का निर्देश दिया गया है जिससे उसकी आध्यात्मिक तीर्थयात्रा अधिक सरल और आनन्दप्रद हो सके। साधारणतः जिन विघ्नों की शिकायत साधक करते हैं वे सब विघ्न अनात्म उपाधियों से हुए तादात्म्य के कारण ही आते हैं। इन उपाधियों के तादात्म्य से मन को परावृत्त करने में वह स्वयं को असमर्थ पाता है। आत्मोन्नति के शास्त्र के रूप में वेदान्त के लिए आवश्यक है कि यह साधक को ध्यान की विधि बताने के साथसाथ सम्भावित विघ्नों का भी संकेत देकर उनसे सुरक्षित रहने के उपायों का भी वर्णन करे। यदि साधक को इनका सम्पूर्ण ज्ञान हो तो शीघ्र ही वह अपनी सुरक्षा कर सकता है। यह श्लोक यह इंगित करता है कि आत्मसंयम और वैराग्य के द्वारा किस प्रकार इस मार्ग पर सुखपूर्वक अग्रसर हुआ जा सकता है।इसी अध्याय में ब्रह्म की लाक्षणिक परिभाषा देते हुए उसे अक्षर कहा गया था। भगवान् श्रीकृष्ण विशेष बल देकर कहते हैं कि जो वीतराग यति हैं वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए इसी अक्षर ब्रह्म में प्रवेश करते हैं।वीतरागा सम्पूर्ण गीता संन्यास का गीत हैं परन्तु यह मन्दबुद्धि पुरुष का अरचनात्मक संन्यास नहीं वरन् विवेक जनित वैराग्य है जो सर्वत्र एवं समस्त प्रगति और विकास का अग्रदूत है कामनाओं का संन्यास बुद्धि की स्वाभाविक परिपक्वता का फल है मन की प्रवृत्तियों का दमन नहीं। नईनई खिली हुई कलियाँ कुछ समय पश्चात् अपनी कोमलसुन्दर पंखुड़ियों के परिधान को त्यागकर शोभनीयता का संन्यास व्यक्त करके नग्नावस्था में खड़ी रहती हैं। परन्तु प्रकृति में यह तभी होता है जब फूलों पर सेचन क्रिया सम्पन्न होकर फल सृजन की क्रिया प्रारम्भ हो गई हो। इन फूलों पर दृष्टिपात करने वाले एक सामान्य पुरुष की दृष्टि से पंखुड़ियों का इस प्रकार बिखर जाना फूल का महान त्याग अथवा संन्यास हो सकता है किन्तु एक कृषक जानता है कि फूलों का यह त्याग उन्हें सद्यः प्राप्त परिपक्वता का परिणाम है जिसके कारण ये सुन्दर पंखुड़ियाँ स्वतः ही बिखर गई हैं।इसी प्रकार भारत के आध्यात्मिक ज्ञान के अन्तर्गत निःसन्देह ही संन्यास अथवा वैराग्य की आवश्यकता पर बल दिया गया है परन्तु उसका अर्थ उदास और विषादपूर्ण आत्मत्याग अथवा स्वयं को दण्डित करना नहीं है। किन्हींकिन्हीं धर्मों में अवश्य ही इस प्रकार के त्याग का प्रचार एवं अभ्यास किया जाता है। उपनिषदों के ऋषियों ने सदा सम्यक् विवेक जनित वैराग्य का ही उपदेश दिया है तथा उसका आग्रह किया है। इसलिए वीतरागाः शब्द से उन साधकों को समझना चाहिए जो विषयों की तुच्छता एवं जीवन के परम लक्ष्य की श्रेष्ठता समझकर विषयासक्ति से सर्वथा मुक्त हो गये हैं।यह भी सर्वविदित तथ्य है कि इच्छाओं की संख्या जितनी अधिक होगी मन में विक्षेप भी उतना ही अधिक होगा। विक्षेपों की अधिकता का अर्थ मानसिक क्षमता की न्यूनता है। साधक की ध्यान में सफलता मन की शक्ति पर निर्भर करती है और मनः शान्ति ही वह धन है जिसके द्वारा इस यात्रा की कठिनाइयाँ और कष्ट कम हो सकते हैं। अतः एक नियम के रूप में कहा जा सकता है कि ज्ञान मार्ग में उन पुरुषों को सफलता का अधिक अवसर है जिनमें कामनाओं की संख्या न्यूनतम है।उपासना का क्रम तथा फल बताने के लिए भगवान् कहते हैं --