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Bhagavad Gita / Chapter 2 / Verse 7
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Bhagavad Gita 2.7

English
Sanskrit
Hindi
Sanskrit

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः | यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||७||

Transliteration

kārpaṇya-doṣhopahata-svabhāvaḥ pṛichchhāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-chetāḥ yach chhreyaḥ syān niśhchitaṁ brūhi tan me śhiṣhyas te 'haṁ śhādhi māṁ tvāṁ prapannam

English

My nature is weighed down by weakness and confusion about my duty. Tell me decisively what is best for me. I am your disciple, surrendered to you — please instruct me.

हिन्दी

करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।

Explanation — English

This is the pivotal verse where Arjuna formally becomes a student. Three things happen: (1) he admits his weakness — "kārpaṇya-doṣhopahata"; (2) he admits confusion — "dharma-sammūḍha"; (3) he surrenders — "śhiṣhyas te'haṁ" (I am your student). This surrender triggers the entire teaching of the Gita.

Explanation — हिन्दी

2.7।। व्याख्या--'कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः'(टिप्पणी प0 43.1)--यद्यपि अर्जुन अपने मनमें युद्धसे सर्वथा निवृत्त होनेको सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते थे, तथापि पापसे बचनेके लिये उनको युद्धसे उपराम होनेके सिवाय दूसरा कोई उपाय भी नहीं दीखता था। इसलिये वे युद्धसे उपराम होना चाहते थे, और उपराम होनेको गुण ही मानते थे, कायरतारूप दोष नहीं। परन्तु भगवान्ने अर्जुनकी इस उपरतिको कायरता और हृदयकी तुच्छ दुर्बलता कहा, तो भगवान्के उन निःसंदिग्ध वचनोंसे अर्जुनको ऐसा विचार हुआ कि युद्धसे निवृत्त होना मेरे लिये उचित नहीं है। यह तो एक तरहकी कायरता ही है, जो मेरे स्वभावके बिलकुल विरुद्ध है क्योंकि मेरे क्षात्र-स्वभावमें दीनता और पलायन (पीठ दिखाना)--ये दोनों ही नहीं हैं  (टिप्पणी प0 43.2) । इस तरह भगवान्के द्वारा कथित कायरतारूप दोषको अपनेमें स्वीकार करते हुए अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि एक तो कायरतारूप दोषके कारण मेरा क्षात्र-स्वभाव एक तरहसे दब गया है; और दूसरी बात, मैं अपनी बुद्धिसे धर्मके विषयमें कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ। मेरी बुद्धिमें ऐसी मूढ़ता छा गयी है कि धर्मके विषयमें मेरी बुद्धि कुछ भी काम नहीं कर रही है तीसरे श्लोकमें तो भगवान्ने अर्जुनको स्पष्टरूपसे आज्ञा दे दी थी कि 'हृदयकी तुच्छ दुर्बलताको, कायरताको छोड़कर युद्धके लिये खड़े हो जाओ'। इससे अर्जुनको धर्म-(कर्तव्य-) के विषयमें कोई सन्देह नहीं रहना चाहिये था। फिर भी सन्देह रहनेका कारण यह है कि एक तरफ तो युद्धमें कुटुम्बका नाश करना, पूज्यजनोंको मारना अधर्म (पाप) दीखता है, और दूसरी तरफ युद्ध करना क्षत्रियका धर्म दीखता है। इस प्रकार कुटुम्बियोंको देखते हुए युद्ध नहीं करना चाहिये और क्षात्र-धर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना चाहिये-- इन दो बातोंको लेकर अर्जुन धर्म-संकटमें पड़ गये। उनकी बुद्धि धर्मका निर्णय करनेमें कुण्ठित हो गयी। ऐसा होनेपर 'अभी इस समय मेरे लिये खास कर्तव्य क्या है? मेरा धर्म क्या है?'इसका निर्णय करानेके लिये वे भगवान्से पूछते हैं। 'यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे'--इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि तू जो कायरताके कारण युद्धसे निवृत्त हो रहा है, तेरा यह आचरण  'अनार्यजुष्ट'  है अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष ऐसा आचरण नहीं करते, वे तो जिसमें अपना कल्याण हो वही आचरण करते हैं। यह बात सुनकर अर्जुनके मनमें आया कि मुझे भी वही करना चाहिये जो श्रेष्ठ पुरुष किया करते हैं। इस प्रकार अर्जुनके मनमें कल्याणकी इच्छा जाग्रत् हो गयी और उसीको लेकर वे भगवान्से अपने कल्याणकी बात पूछते हैं कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो जाय, ऐसी बात मेरेसे कहिये। अर्जुनके हृदयमें हलचल (विषाद) होनेसे और अब यहाँ अपने कल्याणकी बात पूछनेसे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य जिस स्थितिमें स्थित है, उसी स्थितिमें वह संतोष करता रहता है तो उसके भीतर अपने असली उद्देश्यकी जागृति नहीं होती। वास्तविक उद्देश्य--कल्याणकी जागृति तभी होती है, जब मनुष्य अपनी वर्तमान स्थितिसे असन्तुष्ट हो जाय, उस स्थितिमें रह न सके।  'शिष्यस्तेऽहम्'--अपने कल्याणकी बात पूछनेपर अर्जुनके मनमें यह भाव पैदा हुआ कि कल्याणकी बात तो गुरुसे पूछी जाती है, सारथिसे नहीं पूछी जाती। इस बातको लेकर अर्जुनके मनमें जो रथीपनका भाव था, जिसके कारण वे भगवान्को यह आज्ञा दे रहे थे कि 'हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये', वह भाव मिट जाता है और अपने कल्याणकी बात पूछनेके लिये अर्जुन भगवान्के शिष्य हो जाते हैं और कहते हैं कि 'महाराज! मैं आपका शिष्य हूँ, शिक्षा लेनेका पात्र हूँ, आप मेरे कल्याणकी बात कहिये'।  'शाधि मां त्वां प्रपन्नम्'--गुरु तो उपदेश दे देंगे, जिस मार्गका ज्ञान नहीं है, उसका ज्ञान करा देंगे, पूरा प्रकाश दे देंगे, पूरी बात बता देंगे, पर मार्गपर तो स्वयं शिष्यको ही चलना पड़ेगा। अपना कल्याण तो शिष्यको ही करना पड़ेगा। मैं तो ऐसा नहीं चाहता कि भगवान् उपदेश दें और मैं उसका अनुष्ठान करूँ; क्योंकि उससे मेरा काम नहीं चलेगा। अतः अपने कल्याणकी जिम्मेवारी मैं अपनेपर क्यों रखूँ ?गुरुपर ही क्यों न छोड़ दूँ! जैसे केवल माँके दूधपर ही निर्भर रहनेवाला बालक बीमार हो जाय, तो उसकी बीमारी दूर करनेके लिये ओषधि स्वयं माँको खानी पड़ती है, बालकको नहीं। इसी तरह मैं भी सर्वथा गुरुके ही शरण हो जाऊँ, गुरुपर ही निर्भर हो जाऊँ, तो मेरे कल्याणका पूरा दायित्व गुरुपर ही आ जायगा, स्वयं गुरुको ही मेरा कल्याण करना पड़ेगा--इस भावसे अर्जुन कहते हैं कि 'मैं' आपके शरण हूँ, मेरेको शिक्षा दीजिये'। यहाँ अर्जुन  'त्वां प्रपन्नम्' पदोंसे भगवान्के शरण होनेकी बात तो कहते हैं, पर वास्तवमें सर्वथा शरण हुए नहीं हैं। अगर वे सर्वथा शरण हो जाते, तो फिर उनके द्वारा  'शाधि माम्'  'मेरेको शिक्षा दीजिये' यह कहना नहीं बनता; क्योंकि सर्वथा शरण होनेपर शिष्यका अपना कोई कर्तव्य रहता ही नहीं। दूसरी बात, आगे नवें श्लोकमें अर्जुन कहेंगे कि मैं युद्ध नहीं करूँगा'--'न योत्स्ये'।  अर्जुनकी वह बात भी शरणागतिके विरुद्ध पड़ती है। कारण कि शरणागत होनेके बाद 'मैं युद्ध करूँगा या नहीं करूँगा; क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा'--यह बात रहती ही नहीं। उसको यह पता ही नहीं रहता कि शरण्य क्या करायेंगे और क्या नहीं करायेंगे। उसका तो यही एक भाव रहता है कि अब शरण्य जो करायेंगे, वही करूँगा। अर्जुनकी इस कमीको दूर करनेके लिये ही आगे चलकर भगवान्को  'मामेकं शरणं व्रज'  (18। 66) 'एक मेरी शरणमें आ जा'--ऐसा कहना पड़ा। फिर अर्जुनने भी  'करिष्ये वचनं' तव  (18। 73) आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ऐसा कहकर पूर्ण शरणागतिको स्वीकार किया। इस श्लोकमें अर्जुनने चार बातें कहीं हैं--(1) 'कार्पण्यदोषो' ৷৷. 'धर्मसम्मूढचेताः' (2) 'यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे' (3) 'शिष्यस्तेऽहम्' (4) 'शाधि मां त्वां प्रपन्नम्'। इनमेंसे पहली बातमें अर्जुन धर्मके विषयमें पूछते हैं, दूसरी बातमें अपने कल्याणके लिये प्रार्थना करते हैं, तीसरी बातमें शिष्य बन जाते हैं और चौथी बातमें शरणागत हो जाते हैं। अब इन चारों बातोंपर विचार किया जाय, तो पहली बातमें मनुष्य जिससे पूछता है, वह कहनेमें अथवा न कहनेमें स्वतन्त्र होता है। दूसरीमें, जिससे प्रार्थना करता है, उसके लिये कहना कर्तव्य हो जाता है। तीसरीमें, जिनका शिष्य बन जाता है, उन गुरुपर शिष्यको कल्याणका मार्ग बतानेका विशेष दायित्व आ जाता है। चौथीमें जिसके शरणागत हो जाता है उस शरण्यको शरणागतका उद्धार करना ही पड़ता है अर्थात् उसके उद्धारका उद्योग स्वयं शरण्यको करना पड़ता है। सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें अर्जुन भगवान्के शरणागत तो हो जाते हैं पर उनके मनमें आता है कि भगवान्का तो युद्ध करानेका ही भाव है पर मैं युद्ध करना अपने लिये धर्मयुक्त नहीं मानता हूँ। उन्होंने जैसे पहले  'उत्तिष्ठ'  कहकर युद्धके लिये आज्ञा दी ऐसे ही वे अब भी युद्ध करनेकी आज्ञा दे देंगे। दूसरी बात शायद मैं अपने हृदयके भावोंको भगवान्के सामने पूरी तरह नहीं रख पाया हूँ। इन बातोंको लेकर अर्जुन आगेके श्लोकमें युद्ध न करनेके पक्षमें अपने हृदयकी अवस्थाका स्पष्टरूपसे वर्णन करते हैं।

Sanskrit
English
kārpaṇya
weakness
doṣha
defect
upahata
afflicted
svabhāvaḥ
nature
pṛichchhāmi
I ask
tvām
you
dharma
duty
sammūḍha
confused
chetāḥ
mind
yat
what
śhreyaḥ
best
syāt
may be
niśhchitam
decisively
brūhi
tell
tat
that
me
to me
śhiṣhyaḥ
disciple
te
your
aham
I
śhādhi
instruct
mām
me
tvām
unto you
prapannam
surrendered
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2.1Sanjaya said To him who had been thus filled with pity, whose eyes were filled with tears and showed distress, and who was sorrowing, Madhusudana uttered these words:2.2The Blessed Lord said O Arjuna, in this perilous place, whence has come to you this impurity entertained by unenlightened persons, which does not lead to heaven and which brings infamy?2.3O Partha, yield not to unmanliness. This does not befit you. O scorcher of foes, arise, giving up the petty weakness of the heart.2.4Arjuna said O Madhusudana, O destroyer of enemies, how can I fight with arrows in battle against Bhisma and Drona who are worthy of adoration?2.5Rather than killing the noble-minded elders, it is better in this world to live even on alms. But by killing the elders we shall only be enjoying here the pleasures of wealth and desireable things drenched in blood.2.6We do not know this as well as to which is the better for us, (and) whether we shall win, or whether they shall coner us. Those very sons of Dhrtarastra, by killing whom we do not wish to live, stand in confrontation.2.8Because, I do not see that which can, even after aciring on this earth a prosperous kingdom free from enemies and even sovereignty over the gods, remove my sorrow (which is) blasting the senses.2.9Sanjaya said Having spoken thus to Hrsikesa (Krsna), Gudakesa (Arjuna), the afflictor of foes, verily became silent, telling Govinda, 'I shall not fight.' fight.'2.10O descendant of Bharata, to him who was sorrowing between the two armies, Hrsikesa, mocking as it were, said these words:2.11The Supreme Lord said: While speaking learned words, you are mourning for what is not worthy of grief. Those who are wise lament neither for the living nor for the dead.