Adiyogi Arts
सेवाएँअनुसंधानब्लॉगवीडियोप्रार्थनाएँ

खोजें

  • लेख
  • Topics
  • AI वीडियो
  • अनुसंधान
  • हमारे बारे में
  • परियोजनाएँ
  • गोपनीयता नीति

पवित्र ग्रंथ

  • भगवद् गीता
  • हनुमान चालीसा
  • रामचरितमानस
  • पवित्र प्रार्थनाएँ

भगवद् गीता अध्याय

  • 1.Arjuna Vishada Yoga
  • 2.Sankhya Yoga
  • 3.Karma Yoga
  • 4.Jnana Karma Sanyasa Yoga
  • 5.Karma Sanyasa Yoga
  • 6.Dhyana Yoga
  • 7.Jnana Vijnana Yoga
  • 8.Akshara Brahma Yoga
  • 9.Raja Vidya Raja Guhya Yoga
  • 10.Vibhuti Yoga
  • 11.Vishwarupa Darshana Yoga
  • 12.Bhakti Yoga
  • 13.Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
  • 14.Gunatraya Vibhaga Yoga
  • 15.Purushottama Yoga
  • 16.Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
  • 17.Shraddhatraya Vibhaga Yoga
  • 18.Moksha Sanyasa Yoga
Adiyogi Arts
© 2026 Adiyogi Arts
भगवद् गीता / अध्याय 3 / श्लोक 40
← पिछलाअगला →

भगवद् गीता 3.40

हिन्दी
संस्कृत
अंग्रेज़ी
संस्कृत

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते | एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्

लिप्यंतरण

indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate . etairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam

हिन्दी

इन्द्रियाँ,  मन और बुद्धि इसके निवास स्थान कहे जाते हैं;  यह काम इनके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके देही पुरुष को मोहित करता है।।

English

The organs, mind, and the intellect are said to be its abode. This one diversely deludes the embodied being by veiling Knowledge with the help of these.

व्याख्या — हिन्दी

मन की शान्ति और सन्तोष को लूट ले जाने वाले शत्रु काम के पहचाने जाने पर एक सैनिक के समान राजकुमार अर्जुन की अपने शत्रु के निवास स्थान के विषय में जानने की इच्छा थी। अध्यात्म के उपदेशक के रूप में भगवान् को यह बताना आवश्यक था कि यह काम कौन से स्थान पर रहकर अपनी अत्यन्त दुष्ट योजनाएँ बनाता है। कामना का निवास स्थान है इन्द्रियाँ मन और बुद्धि।बड़े विस्तृत क्षेत्र में अपराध करने वाले दस्यु दल के सरदार के एक से अधिक रहने के स्थान होते हैं जहाँ से वह पूरे दल का संचालन करता है। यहाँ भी कामनारूप शत्रु के स्थानों का स्पष्ट निर्देश किया गया है।बिना किसी नियन्त्रण एवं संयम के इन्द्रियां यदि विषयों में संचार करती हैं तो वे इच्छा के निवास के लिए प्रथम उपयुक्त स्थान हैं। इन्द्रियों के माध्यम से विषय की संवेदनाएँ मन में पहुंचने पर वह भी कामनाजन्य दुखों की उत्पत्ति के लिए उपयुक्त क्षेत्र का कार्य करता है। और अन्त में पूर्व विषयोपभोग की स्मृति से रंजित आसक्तियों से युक्त बुद्धि कामना का तीसरा सुरक्षित वासस्थान है।अविद्या से मोहित जीव शरीर के साथ तादात्म्य करके विषयोपभोग चाहता है। अविवेकपूर्वक मन और बुद्धि के साथ तादात्म्य करके भावनाओं एवं विचारों की सन्तुष्टि की वह इच्छा करता है।इन स्थानों पर इच्छा को खोजना माने शत्रु का सामना करना है। अन्त में शत्रु नाश कैसे करना है इसका वर्णन आगे के श्लोकों में किया गया है

व्याख्या — English

If the abode of the enemy is known it is ite easy to kill him. So Lord Krishna like a wise army general points out to Arjuna the abode of desire so that he may be able to attack it and kill it ite readily.

संस्कृत
English
इन्द्रियाणि
the senses
मनः
the mind
बुद्धिः
the intellect
अस्य
its
अधिष्ठानम्
seat
उच्यते
is called
एतैः
by these
विमोहयति
deludes
एषः
this
ज्ञानम्
wisdom
आवृत्य
having enveloped
देहिनम्
the embodied.
खोजेंसभी अध्यायहनुमान चालीसापवित्र ग्रंथपवित्र प्रार्थनाएँलेख

अध्याय 3 से और

सभी श्लोक देखें →
3.1।।3.1।। हे जनार्दन यदि आपको यह मान्य है कि कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर हे केशव आप मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों प्रवृत्त करते हैं3.2।।3.2।। आप इस मिश्रित वाक्य से मेरी बुद्धि को मोहितसा करते हैं अत आप उस एक (मार्ग) को निश्चित रूप से कहिये जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त कर सकूँ।।3.3।।3.3।। श्री भगवान् ने कहा हे निष्पाप (अनघ) अर्जुन इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ज्ञानियों की (सांख्यानां) ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।।3.4।।3.4।। कर्मों के न करने से मनुष्य नैर्ष्कम्य को प्राप्त नहीं होता और न कर्मों के संन्यास से ही वह सिद्धि (पूर्णत्व) प्राप्त करता है।।3.5।।3.5।। कोई भी पुरुष कभी क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा अवश हुए सब (पुरुषों) से कर्म करवा लिया जाता है।।3.6।।3.6।। जो मूढ बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियों का निग्रह कर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण (चिन्तन) करता रहता है वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है।।3.7।।3.7।। परन्तु हे अर्जुन जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ कर्मेंन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है वह श्रेष्ठ है।।3.8।।3.8।। तुम (अपने) नियत (कर्तव्य) कर्म करो क्योंकि अकर्म से श्रेष्ठ कर्म है। तुम्हारे अकर्म होने से (तुम्हारा) शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।।3.9।।3.9।। यज्ञ के लिये किये हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में प्रवृत्त हुआ यह पुरुष कर्मों द्वारा बंधता है इसलिए हे कौन्तेय आसक्ति को त्यागकर यज्ञ के निमित्त ही कर्म का सम्यक् आचरण करो।।3.10।।3.10।। प्रजापति (सृष्टिकर्त्ता) ने (सृष्टि के) आदि में यज्ञ सहित प्रजा का निर्माण कर कहा इस यज्ञ द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम्हारे लिये इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला (इष्टकामधुक्) होवे।।