इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः | सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ . sarge.api nopajāyante pralaye na vyathanti ca
इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप (सार्धम्यम्) को प्राप्त पुरुष सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते और प्रलयकाल में व्याकुल भी नहीं होते हैं।।
Those who attain identity with Me by resorting of this Knowledge are not born even during creation, nor do they suffer pain during dissolution.
इस अध्याय में उपदिष्ट ज्ञान की महत्ता सैद्धान्तिक दृष्टि से उतनी अधिक नहीं है? जितनी कि साधना में उसके द्वारा होने वाले लाभ से है। इस अध्याय के गम्भीर अभिप्रायों को सम्यक् रूप से जानने वाला साधक पूर्णत्व की स्थिति को प्राप्त होता है। भगवान् कहते हैं? वे मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं।गीता में? भगवान् श्रीकृष्ण मैं शब्द का प्रयोग आध्यात्मिक पूर्णत्व की दृष्टि से ही करते हैं। इस अध्याय का विषय उन गुणों की क्रीड़ा का अध्ययन करना है? जो हमें उपाधियों ओर अहंभाव के साथ बांध देते हैं। यदि एक बार हम उनसे मुक्त होकर अपने मन पर होने वाले उनके प्रभाव को समाप्त कर दें? तो तत्क्षण ही जीव भाव से मुक्त होकर हम अपने पारमार्थिक स्वरूप का अनुभव कर सकते हैं।स्वप्नद्रष्टा को स्वप्नावस्था में सत्य प्रतीत होने वाले दुख जाग्रत् अवस्था में असत् हो जाते हैं। नियम यह है कि एक अवस्था के सुखदुखादि अनुभव अन्य अवस्था में प्रभावशील नहीं होते हैं। अत? आत्म अज्ञान की अवस्था का उपाधि तादात्म्य तथा तज्जनित संसार का बन्धन जीव को ही सत्य प्रतीत होता है आत्मज्ञानी पुरुष को नहीं। ज्ञानी पुरुष अपने उस सर्वत्र व्याप्त सत्यस्वरूप को पहचानता है? जिसकी न उत्पत्ति है और न प्रलय।इसे यहाँ एक वाक्य से इंगित किया गया है? वे सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते हैं सृष्टि मन का एक खेल है। जब हम मन से तादात्म्य नहीं करेंगे? तब हम उससे अविच्छिन्न भी नहीं होंगे? और इस प्रकार हमें सृष्टि का कोई अनुभव भी नहीं होगा। उदाहरणार्थ? जब कोई व्यक्ति क्रोधावेश में आ जाता है? तब वह एक क्रोधी व्यक्ति के रूप में व्यवहार करता है परन्तु क्रोध से निवृत्त होने और मन के शान्त हो जाने पर वह वैसा व्यवहार नहीं कर सकता। मन की युक्ति यह है कि वह विचारों के द्वारा एक सृष्टि की कल्पना करता है? और फिर उसी के साथ तादात्म्य कर स्वयं को इस प्रकार बन्धन में अनुभव करता है मानो उससे मुक्ति पाना कदापि संभव ही न हो। जब तक हम मन में ही डूबे रहेंगे तब तक उसके क्षोभ से उद्वेलित भी होते रहेंगे। मन से अतीत अर्थात् मुक्त होने पर शुद्ध आत्मा में कोई सृष्टि नहीं है? तब हमें जन्म का अनुभव कैसे हो सकता है और उस स्थिति में प्रलय से भय कैसा वह पूर्ण मुक्ति की स्थिति है।परन्तु अपने मन पर विजय पाने के लिये? साधक को मन की उन युक्तियों (योजनाओं) का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है? जिनके द्वारा यह प्राय उसे छलता रहता है। शत्रु पर आक्रमण करने के पूर्व उसकी रणनीति का ज्ञान प्राप्त करना अपरिहार्य होता है। इस दृष्टि से? भगवान् का यह कथन भी समीचीन है कि इन तीन गुणों का सम्पूर्ण ज्ञान साधक को अपने मन पर विजय प्राप्त कराने में सहायक होगा और इस प्रकार वह अपनी समस्त प्रकार की अपूर्णताओं से मुक्ति प्राप्त कर सकेगा।अब? भगवान् कहते हैं कि किस प्रकार जड़ और चेतन के सम्बन्ध में इस दुखपूर्ण संसार की उत्पत्ति होती है
Having resorted to this knowledge they (the sages) are assimilated into My own nature. They have attained to My Being. They have become identical with Me. They live in Me with no thought of thou or I. They go beyond birth and death. There is no birth for them when creation begins and there is no death for them at the time of dissolution. Having reached Me they attain eternity? immortality and perfection. Having become identical with Me through the attainment of the knowledge of the Self by practising the necessary means? they are neither born at the time of creation nor are they disited at the time of dissolution. Knowledge of the Self is eulogised by the Lord in this verse.