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भगवद् गीता / अध्याय 7 / श्लोक 23
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भगवद् गीता 7.23

हिन्दी
संस्कृत
अंग्रेज़ी
संस्कृत

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् | देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि

लिप्यंतरण

antavattu phalaṃ teṣāṃ tadbhavatyalpamedhasām . devāndevayajo yānti madbhaktā yānti māmapi

हिन्दी

परन्तु उन अल्प बुद्धि पुरुषों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

English

That result of theirs who are of poor intellect is indeed limited. The worshippers of gods go to the gods. My devotees go to Me alone.

व्याख्या — हिन्दी

नाशवान् भोगों की इच्छा को पूर्ण करने के लिए मनुष्य जो कर्म करता है वह अनित्य होने से उसका फल भी क्षणभंगुर ही होता है। स्वर्ण से बने आभूषण स्वर्ण ही होंगे। कार्य का गुणधर्म पूर्णतया कारण पर निर्भर करता है।देशकाल से परिच्छिन्न कर्मों से प्राप्त फल अनित्य ही होगा चाहे वह सुख हो या दुख। सुख का अन्त दुख का प्रारम्भ है। अत जब कोई इच्छा पूर्ण हो जाती है तब यद्यपि क्षणमात्र के लिए सुख का आभास भी होता है परन्तु शीघ्र ही उसके समाप्त होने पर दुख का कटु अनुभव मनुष्य को होता है।भगवान् श्रीकृष्ण सामान्य नियम बताते हैं कि देवपूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं। जिस नियम का जो अधिष्ठाता देवता है या जिस क्षेत्र में जो उत्पादन क्षमता है उसका आह्वान करने पर मनुष्य केवल उसी फल को प्राप्त कर सकता है।इसी प्रकार मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं। परिच्छिन्न भोगों के लिए मनुष्य इतना अधिक प्रयत्न करके अन्त में क्षणिक फल को ही प्राप्त करता है। यदि वही प्रयत्न वह दैवी जीवन जीने में करे तो उसे नित्य आनन्दस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है। किन्तु मन की बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के कारण वह अनात्म उपाधियों से तादात्म्य करके बाह्य वैषयिक जगत् में ही रमता है।विवेकी पुरुष विषयोपभोग की तुच्छता और व्यर्थता को पहचान कर उनसे विरक्त हो जाते हैं। विवेक और वैराग्य से सम्पन्न होकर जब वे आत्मस्वरूप का ध्यान करते हैं तब उन्हें परम आनन्दस्वरूप की वह अनुभूति होती है जो शरीर मन और बुद्धि तीनों के परे है नित्य है।गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने जो मैं शब्द का प्रयोग किया है वह उस अनन्त तत्त्व को सूचित करता है जो व्यष्टि और समष्टि का अधिष्ठान है। अत वे कहते हैं कि मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं तब उनका तात्पर्य ऐतिहासिक पुरुष देवकी पुत्र कृष्ण से नहीं वरन् चैतन्यस्वरूप पुरुष से होता है। इस दृष्टि से आत्मवित् आत्मस्वरूप ही बन जाता है। यही भगवान् श्रीकृष्ण के कथन का वास्तविक अभिप्राय है।तब क्या कारण है कि सामान्य जन आपको प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं करता उत्तर है

व्याख्या — English

The exertion in the two kinds is the same and yet people do not attempt to worship the Supreme Being in order to attain the maximum benefits or the infinite reward (liberation or Moksha). The reward obtained by men of small understandng and petty intellect who worship the minor deities is small? perishable and temporary.Yajnas (Vedic rituals)? Homas (rituals in which oblations are offered into the sacred fire) and Tapas (penance) of various sorts can bestow only temporary rewards on the performer. Liberation from the wheel of transmigration alone will give everlasting bliss and eternal peace.Those who worship Indra and others are Sattvic devotees those who worship Yakshas and Rakshasas (demoniacal beings) are Rajasic devotees and those who worship the Bhutas and Pretas (discarnate spirits) are Tamasic devotees.The knowledge of those who worship the small deities is partial and incomplete. It cannot lead to liberation. (Cf.IX.25)

संस्कृत
English
अन्तवत्
finite
तु
verily
फलम्
the fruit
तेषाम्
of them
तत्
that
भवति
is
अल्पमेधसाम्
those of small intelligence
देवान्
to the gods
देवयजः
the worshippers of the gods
यान्ति
go to
मद्भक्ताः
My devotees
यान्ति
go to
माम्
Me
अपि
also.
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अध्याय 7 से और

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7.1।।7.1।। हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।7.2।।7.2।। मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ (जगत् में) फिर और कुछ जानने योग्य (ज्ञातव्य) शेष नहीं रह जाता है।।7.3।।7.3।। सहस्रों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य पूर्णत्व की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील साधकों में भी कोई ही पुरुष मुझे तत्त्व से जानता है।।7.4।।7.4।। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।7.5।।7.5।। हे महाबाहो ! यह अपरा प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी जीवरूपी पराप्रकृति को जानो, जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।।7.6।।7.6।। यह जानो कि समम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से उत्पत्ति वाले हैं। (अत:) मैं सम्पूर्ण जगत् का उत्पत्ति तथा प्रलय स्थान हूँ।।7.7।।7.7।। हे धनंजय ! मुझसे श्रेष्ठ (परे) अन्य किचिन्मात्र वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है।।7.8।।7.8।। हे कौन्तेय ! जल में मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सब वेदों में प्रणव (ँ़कार) हूँ तथा आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।।7.9।।7.9।। पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; सम्पूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में मैं तप हूँ।।7.10।।7.10।। हे पार्थ ! सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज (कारण) मुझे ही जानो; मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।।