Adiyogi Arts
सेवाएँअनुसंधानब्लॉगवीडियोप्रार्थनाएँ

खोजें

  • लेख
  • Topics
  • AI वीडियो
  • अनुसंधान
  • हमारे बारे में
  • परियोजनाएँ
  • गोपनीयता नीति

पवित्र ग्रंथ

  • भगवद् गीता
  • हनुमान चालीसा
  • रामचरितमानस
  • पवित्र प्रार्थनाएँ

भगवद् गीता अध्याय

  • 1.Arjuna Vishada Yoga
  • 2.Sankhya Yoga
  • 3.Karma Yoga
  • 4.Jnana Karma Sanyasa Yoga
  • 5.Karma Sanyasa Yoga
  • 6.Dhyana Yoga
  • 7.Jnana Vijnana Yoga
  • 8.Akshara Brahma Yoga
  • 9.Raja Vidya Raja Guhya Yoga
  • 10.Vibhuti Yoga
  • 11.Vishwarupa Darshana Yoga
  • 12.Bhakti Yoga
  • 13.Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
  • 14.Gunatraya Vibhaga Yoga
  • 15.Purushottama Yoga
  • 16.Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
  • 17.Shraddhatraya Vibhaga Yoga
  • 18.Moksha Sanyasa Yoga
Adiyogi Arts
© 2026 Adiyogi Arts
भगवद् गीता / अध्याय 5 / श्लोक 7
← पिछलाअगला →

भगवद् गीता 5.7

हिन्दी
संस्कृत
अंग्रेज़ी
संस्कृत

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः | सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते

लिप्यंतरण

yogayukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ . sarvabhūtātmabhūtātmā kurvannapi na lipyate

हिन्दी

जो पुरुष योगयुक्त, विशुद्ध अन्तकरण वाला, शरीर को वश में किये हुए, जितेन्द्रिय तथा भूतमात्र में स्थित आत्मा के साथ एकत्व अनुभव किये हुए है वह कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता।।

English

Endowed with yoga, [i.e. devoted to the performance of the nitya and naimittika duties.] pure in mind, controlled in body, a coneror of the organs, the Self of the selves of all beings-he does not become tainted even while performing actions. [The construction of the sentence is this: When this person resorts to nitya and naimittika rites and duties as a means to the achievement of fully Illumination, and thus becomes fully enlightened, then, even when he acts through the apparent functions of the mind, organs, etc., he does not become afflected.]

व्याख्या — हिन्दी

पूर्व श्लोक में संक्षेप में वर्णन है कि कर्मयोग पालन करने पर चित्तशुद्धि प्राप्त होकर साधक ध्यानाभ्यास की सहायता से ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। वर्तमान की परिच्छिन्नता एवं बन्धनों को तोड़कर अनन्तस्वरूप की प्राप्ति के प्रयत्न में जो आन्तरिक परिवर्तन साधक में होता है उसका युक्तियुक्त विस्तृत विवेचन इस श्लोक में किया गया है।कर्मयोग से युक्त पुरुष अन्तकरण की शुद्धि प्राप्त करता है जिसका अर्थ है अधिकसेअधिक मन की आन्तरिक शान्ति। मन का कमसेकम क्षुब्ध होना उसकी शुद्धि का द्योतक है। इसे ही दूसरे शब्दों में कहते हैं वासनाओं का क्षीण होना। विक्षेप की कारणरूप वासनाओं का क्षय होने पर स्वाभाविक रूप से वह पुरुष संतुलित बन जाता है।ऐसे शुद्धान्तकरण सम्पन्न कर्मयोगी के लिए इन्द्रियों पर संयम रखना बच्चों का खेल बन जाता है। वह स्वेच्छा से इन्द्रियों को विषयों में प्रवृत्त कर सकता है और निवृत्त भी। जिस साधक को अपने शरीर मन एवं बुद्धि पर पूर्ण संयम है वह ध्यान की सर्वोच्च साधना के लिए योग्यतम है। निदिध्यासन में आने वाले मुख्य विघ्न ये ही हैं वैषयिक प्रवृत्ति मन के विक्षेप एवं अतृप्त इच्छाएं। एक बार इन शृंखलाओं को तोड़ देने पर ध्यान सहज और सुलभ बन जाता है फिर साधक को आत्मा का साक्षात् अनुभव तत्काल और उसकी सम्पूर्णता में होता है।आत्मानुभूति आंशिक रूप में नहीं हो सकती। यदि साधक केवल स्वयं को दिव्य और शुद्ध स्वरूप अनुभव करे और अन्यों को नहीं तो उसका अनुभव वास्तविक और प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता। सम्यक् दर्शन को प्राप्त हुये पुरुष के लिए तो शुद्ध आत्मा सर्वत्र एवं समस्त कालों में व्याप्त है। इस आध्यात्मिक दृष्टि से जगत् को देखने पर उसे सर्वत्र सम्पूर्ण प्राणियों में नित्य आत्मा का ही दर्शन होता है। ऐसे ज्ञानी पुरुष को ही यहाँ सर्वभूतात्मभूतात्मा कहा गया है जिसका अर्थ है वह पुरुष जिसकी आत्मा ही सर्वभूतों की आत्मा है।जब एक तरंग अपने वास्तविक समुद्र स्वरूप को पहचान लेती है तब ज्ञान में स्थित उस तरंग के लिए कोई भी अन्य तरंग समुद्र से भिन्न नहीं हो सकती।आत्मानुभूति में स्थित हुआ पुरुष जब जगत् में कर्म करता है तब वे कर्म वासना के रूप में प्रतिफल उत्पन्न नहीं करते। कर्मफलों का बन्धन केवल अहंकार को ही हो सकता है और ज्ञानी पुरुष में उसी का अभाव होने के कारण कर्म उसे किस प्रकार लिप्त कर सकते हैं प्रवाहित जल पर लिखने के समान ही ज्ञानी पुरुष के कर्म उसके चित्त पर वासनाएँ नहीं उत्पन्न करते।भगवान् श्रीकृष्ण कर्मयोग के सिद्धान्त का पुनपुन प्रतिपादन करते हैं। इस श्लोक से भी स्पष्ट होता है कि अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित होकर किये गये कर्मं ही वासना उत्पन्न करके बुद्धि की विवेकशक्ति को धूमिल कर देते हैं जिसके कारण मनुष्य को अपने स्वयंसिद्ध शुद्ध दिव्य स्वरूप का अनुभव नहीं हो पाता।सर्वव्यापी परमात्मा के अनुभव में स्थित सिद्ध पुरुष का जीवन की ओर देखने का क्या दृष्टिकोण होगा भगवान् कहते हैं

व्याख्या — English

He who is harmonised by Yoga? i.e.? he who has purified his mind by devotion to the performance of action? who has conered the body and who has subjugated the senses? whose Self is the Self of all beings? he will not be bound by actions although he performs actions for the wellbeing or protection of the masses in orer to set an example to them. (Cf.XVIII.17)

संस्कृत
English
योगयुक्तः
devoted to the path of action
विशुद्धात्मा
a man of purified mind
विजितात्मा
one who has conered the self
जितेन्द्रियः
one who has subdued his senses
सर्वभूतात्मभूतात्मा
one who realises his Self as the Self in all beings
कुर्वन्
acting
अपि
even
न
not
लिप्यते
is tainted.
खोजेंसभी अध्यायहनुमान चालीसापवित्र ग्रंथपवित्र प्रार्थनाएँलेख

अध्याय 5 से और

सभी श्लोक देखें →
5.1।।5.1।। अर्जुन ने कहा हे --  कृष्ण ! आप कर्मों के संन्यास की और फिर योग (कर्म के आचरण) की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में एक जो निश्चय पूर्वक श्रेयस्कर है, उसको मेरे लिए कहिये।।5.2।।5.2।। श्रीभगवान् ने कहा --  कर्मसंन्यास और कर्मयोग ये दोनों ही परम कल्याणकारक हैं;  परन्तु उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।।5.3।।5.3।। जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा,  वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है;  क्योंकि,  हे महाबाहो ! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्धन मुक्त हो जाता है।।5.4।।5.4।। बालक अर्थात् बालबुद्धि के लोग सांख्य (संन्यास) और योग को परस्पर भिन्न समझते हैं;  किसी एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ पुरुष दोनों के फल को प्राप्त कर लेता है।।5.5।।5.5।। जो स्थान ज्ञानियों द्वारा प्राप्त किया जाता है,  उसी स्थान पर कर्मयोगी भी पहुँचते हैं। इसलिए जो पुरुष सांख्य और योग को (फलरूप से) एक ही देखता है,  वही (वास्तव में) देखता है।।5.6।।5.6।। परन्तु,  हे महाबाहो ! योग के बिना संन्यास प्राप्त होना कठिन है;  योगयुक्त मननशील पुरुष परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त होता है।।5.8।।5.8।। तत्त्ववित् युक्त पुरुष यह सोचेगा (अर्थात् जानता है) कि  "मैं किंचित् मात्र कर्म नहीं करता हूँ"  देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ,।।5.9।।5.9।। बोलता हुआ,  त्यागता हुआ,  ग्रहण करता हुआ  तथा आँखों को खोलता और बन्द करता हुआ (वह) निश्चयात्मक रूप से जानता है कि सब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में विचरण कर रही हैं।।5.10।।5.10।। जो पुरुष सब कर्म ब्रह्म में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर करता है,  वह पुरुष कमल के पत्ते के सदृश पाप से लिप्त नहीं होता।।5.11।।5.11।। योगीजन, शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा आसक्ति को त्याग कर आत्मशुद्धि (चित्तशुद्धि) के लिए कर्म करते हैं।।