श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप | सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते
śreyāndravyamayādyajñājjñānayajñaḥ parantapa . sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate
हे परन्तप ! द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ ! सम्पूर्ण अखिल कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं, अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।।
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भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मोन्नति के लिए अनेक द्रव्य पदार्थों के उपयोग से सिद्ध होने वाले यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ ही श्रेष्ठ है। दूसरी पंक्ति में भगवान् उसके श्रेष्ठत्व का कारण भी बताते हैं। कर्मकाण्ड में उपादिष्ट द्रव्यमय यज्ञ ऐसे फलों को उत्पन्न करते हैं जिनके उपभोग के लिए कर्तृत्वाभिमानी जीव को अनेक प्रकार के देह धारण करने पड़ते हैं जिनमें और भी नएनए कर्म किये जाते रहते हैं। कर्म से ही कर्म की समाप्ति नहीं होती। अत कर्म की पूर्णता स्वयं में ही कभी नहीं हो सकती।इसके विपरीत ज्ञान के प्रकाश में अज्ञान जनित अहंकार नष्ट हो जाता है। अज्ञान से कामना और कामना से कर्म उत्पन्न होते हैं। इसलिए ज्ञान के द्वारा कर्म के मूल स्रोत अज्ञान के ही नष्ट हो जाने पर कर्म स्वत समाप्त हो जाते हैं। सम्पूर्ण कर्मों की परिसमाप्ति ज्ञान में होती है।यदि केवल ज्ञान से ही पूर्णत्व की प्राप्ति होती हो तो उस ज्ञान को हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं जिससे कि सब कर्मों का क्षय तत्काल हो जाये इसका उत्तर है
Sacrifices with material objects cause material effects and bring the sacrificer to this world for the enjoyment of the fruits? while wisdomsacrifice leads to Moksha. Therefore wisdomsacrifice is superior to the sacrifice performed with material objects. Just as rivers join the ocean? so do all actions join knowledge? i.e.? they culminate in knowledge. All actions purify the heart and lead to the dawn of knowledge of the Self.All actions that are performed as offerings unto the Lord with their fruits are contained in the knowledge of Brahman. (Cf.IX.15X.25XVIII.70)