Adiyogi Arts
सेवाएँअनुसंधानब्लॉगवीडियोप्रार्थनाएँ

खोजें

  • लेख
  • Topics
  • AI वीडियो
  • अनुसंधान
  • हमारे बारे में
  • परियोजनाएँ
  • गोपनीयता नीति

पवित्र ग्रंथ

  • भगवद् गीता
  • हनुमान चालीसा
  • रामचरितमानस
  • पवित्र प्रार्थनाएँ

भगवद् गीता अध्याय

  • 1.Arjuna Vishada Yoga
  • 2.Sankhya Yoga
  • 3.Karma Yoga
  • 4.Jnana Karma Sanyasa Yoga
  • 5.Karma Sanyasa Yoga
  • 6.Dhyana Yoga
  • 7.Jnana Vijnana Yoga
  • 8.Akshara Brahma Yoga
  • 9.Raja Vidya Raja Guhya Yoga
  • 10.Vibhuti Yoga
  • 11.Vishwarupa Darshana Yoga
  • 12.Bhakti Yoga
  • 13.Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
  • 14.Gunatraya Vibhaga Yoga
  • 15.Purushottama Yoga
  • 16.Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
  • 17.Shraddhatraya Vibhaga Yoga
  • 18.Moksha Sanyasa Yoga
Adiyogi Arts
© 2026 Adiyogi Arts
भगवद् गीता / अध्याय 2 / श्लोक 44
← पिछलाअगला →

भगवद् गीता 2.44

हिन्दी
संस्कृत
अंग्रेज़ी
संस्कृत

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् | व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते

लिप्यंतरण

bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām . vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate

हिन्दी

उससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और एश्र्वर्य‌ मॆ आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण मे निश्चयात्मक् बुद्धि नही हॊती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य‌ नही होते।

English

One-pointed conviction does not become established in the minds of those who delight in enjoyment and affluence, and whose intellects are carried away by that (speech).

व्याख्या — हिन्दी

महर्षि व्यास ऐसे पहले साहसी क्रान्तिकारी थे जिन्होंने अपने काल में अत्यन्त शोचनीय पतन की स्थिति से हिन्दू संस्कृति का पुनरुत्थान किया। क्रान्ति का वह ग्रन्थ गीता है जिसकी रचना उन्होंने की। अपने काल की स्थितियों की उनके द्वारा की गयी तीव्र आलोचना भगवान् के इन शब्दों से स्पष्ट होती है जहां श्रीकृष्ण वेदों के कर्मकाण्ड को पुष्पिता वाणी कहते हैं। कर्मकाण्ड की तीव्र आलोचना करने में व्यास जी के साहस को समझने के लिये हमें उस काल के पुरोगामी पारम्परिक वातावरण की कल्पना करनी होगी हमें मानसिक रूप से उस काल में रहना होगा।वेदों का कर्मकाण्ड उन लोगों के लिए है जो विषयोपभोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं कर्मफल पाने की इच्छा और चिन्ता के कारण जिनकी सदसद् विवेक की क्षमता खो गयी है। सर्वोच्च साध्य को भूलकर साधनभूत कर्मों में ही वे लिप्त रहते हैं।वेदोक्त कर्मों को अत्यन्त परिश्रमपूर्वक करना पड़ता है तब मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग के रूप में उनका फल प्राप्त होता है जहाँ अलौकिक विषयों का उपभोग किया जा सकता है। इन सब प्रयत्नों में कामनाओं और चिन्ताओं आदि के कारण व्यक्तित्व के विकास के लिये अवसर नहीं मिलता इसलिये व्यास जी का विचार है कि अध्यात्म की दृष्टि से ये सकाम कर्म निरर्थक हैं। कर्मकाण्ड में आसक्त पुरुष जीवन के परम साध्य को भूलकर साधन में ही फंसा रह जाता है।अनन्तस्वरूप परम सत्य के प्रतिपादक के रूप में श्रीकृष्ण उन लोगों की हँसी उड़ाते हैं जो साधन को ही साध्य मानने की त्रुटि करते हैं। कर्मकाण्ड में ही उपदिष्ट केवल कर्तव्य कर्म के पालन से चित्त शुद्धि एवं एकाग्रता प्राप्त होती है और इस प्रकार ध्यान का अभ्यास करने की योग्यता पाकर उपनिषदों में निरूपित निदिध्यासन के द्वारा आत्मा का अपरोक्ष अनुभव प्राप्त होता है जो जीवन का वास्तविक साध्य है। कर्म में ही रत पुरुषों को जीवन में कभी शान्ति नहीं मिलती।अविवेकी कामी पुरुषों को क्या फल मिलता है भगवान् कहते हैं

व्याख्या — English

Those who cling to pleasure and power cannot have steadiness of mind. They cannot concentrate or meditate. They are ever busy in planning projects for the acisition of wealth and power. Their minds are ever restless. They have no poised understanding.

संस्कृत
English
भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्
of the people deeply attached to pleasure and lordship
तया
by that
अपहृतचेतसाम्
whose minds are drawn away
व्यवसायात्मिका
determinate
बुद्धिः
reason
समाधौ
in Samadhi
न
not
विधीयते
is fixed.
खोजेंसभी अध्यायहनुमान चालीसापवित्र ग्रंथपवित्र प्रार्थनाएँलेख

अध्याय 2 से और

सभी श्लोक देखें →
2.1।।2.1।। संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत,  अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।2.2।।2.2।। श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ?  यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।2.3।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।2.4।।2.4।। अर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।।2.5।।2.5।। इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है, क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।2.6।।2.6।। हम नहीं जानते कि हमें क्या करना उचित है। हम यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे, या वे हमको जीतेंगे, जिनको मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।।2.7।।2.7।। करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो, उसे आप निश्चय करके कहिये, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ; शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।2.8।।2.8।। पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य को और देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।।2.9।।2.9।। संजय ने कहा -- इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द "मैं युद्ध नहीं करूँगा" चुप हो गया।।2.10।।2.10।। हे भारत (धृतराष्ट्र) ! दोनों सेनाओं के बीच में उस शोकमग्न अर्जुन को भगवान् हृषीकेश ने हँसते हुए से यह वचन कहे।।