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Gita / Chapter 9.6
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् | तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय

Transliteration

yathākāśasthito nityaṃ vāyuḥ sarvatrago mahān . tathā sarvāṇi bhūtāni matsthānītyupadhāraya

English

Understand thus that just as the voluminous wind moving everywhere is ever present in space, similarly all beings abide in Me.

Hindi

जैसे सर्वत्र विचरण करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा तुम जानो।।

Sanskrit
English
यथा
as
आकाशस्थितः
rests in the Akasa
नित्यम्
always
वायुः
the air
सर्वत्रगः
moving everywhere
महान्
great
तथा
so
सर्वाणि
all
भूतानि
beings
मत्स्थानि
rest in Me
इति
thus
उपधारय
know.
Hindi

इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयत्न कर रहे भ्रमित राजकुमार अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण एक सुन्दर एवं स्पष्ट दृष्टान्त देकर उसकी सहायता करते हैं। किसी ऐसी वस्तु की कल्पना कर सकना अत्यन्त कठिन है जो सर्वत्र विद्यमान है? जिसमें सबकी स्थिति है और फिर भी? वह स्वयं उन सब वस्तुओं के दोषों से लिप्त या बद्ध नहीं होती। सामान्य मनुष्य की बुद्धि इस ज्ञान की ऊँचाई तक सरलता से उड़ान नहीं भर सकती। शिष्य की ऐसी बुद्धि के लिये एक टेक या आश्रय के रूप में यहाँ एक अत्यन्त सुन्दर और आकर्षक उदाहरण प्रस्तुत किया गय