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Gita / Chapter 7.1
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

श्रीभगवानुवाच | मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु

Transliteration

śrībhagavānuvāca . mayyāsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjanmadāśrayaḥ . asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tacchṛṇu

English

The Blessed Lord said O Partha, hear how you, having the mind fixed on Me, practising the Yoga of Meditation and taking refuge in Me, will know Me with certainly and in fulness.

Hindi

हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।

Sanskrit
English
मयि
on Me
आसक्तमनाः
with mind intent
पार्थ
O Partha
योगम्
Yoga
युञ्जन्
practising
मदाश्रयः
taking refuge in Me
असंशयम्
without doubt
समग्रम्
wholly
माम्
Me
यथा
how
ज्ञास्यसि
shall know
तत्
that
श्रृणु
hear.
Hindi

ध्यानाभ्यास का आरम्भ करने के पूर्व साधक जब तक केवल बौद्धिक स्तर पर ही वेदान्त का विचार करता है जैसा कि प्रारम्भ में होना स्वाभाविक है तब तक उसके मन में प्रश्न उठता रहता है कि परिच्छिन्न मन के द्वारा अनन्तस्वरूप सत्य का साक्षात्कार किस प्रकार किया जा सकता है यह प्रश्न सभी जिज्ञासुओं के मन में आता है और इसीलिए वेदान्तशास्त्र इस विषय का विस्तार से वर्णन करता है कि किस प्रकार ध्यान की प्रक्रिया से मन अपनी ही परिच्छिन्नताओं से ऊपर उठकर अपने अनन्तस्वरूप का अनुभव करता है।इस षडाध्यायी के विवेच्य