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Gita / Chapter 5.10
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः | लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा

Transliteration

brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ . lipyate na sa pāpena padmapatramivāmbhasā

English

One who acts by dedicating actions to Brahman and by renouncing attachment, he does not become polluted by sin, just as a lotus leaf is not by water.

Hindi

जो पुरुष सब कर्म ब्रह्म में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर करता है,  वह पुरुष कमल के पत्ते के सदृश पाप से लिप्त नहीं होता।।

Sanskrit
English
ब्रह्मणि
in Brahman
आधाय
having placed
कर्माणि
actions
सङ्गम्
attachment
त्यक्त्वा
having abandoned
करोति
acts
यः
who
लिप्यते
is tainted
न
not
सः
he
पापेन
by sin
पद्मपत्रम्
lotusleaf
इव
like
अम्भसा
by water.
Hindi

दो पूर्ववर्ती श्लोकों में वर्णित ज्ञान ब्रह्म स्वरूप में रमे हुए तत्त्ववित् पुरुषों के लिये सत्य हो सकता है परन्तु निरहंकार और अनासक्ति का जीवन सर्व सामान्य जनों के लिये सुलभ नहीं होता। पूर्णत्व के साधकों को यही कठिनाई आती है। जो साधकगण गीता ज्ञान को जीना चाहते हैं और न कि तत्प्रतिपादित सिद्धान्तों की केवल चर्चा करना उनकी यही समस्या होती है कि किस प्रकार वे अहंकार का त्याग करें। इस समस्या का निराकरण विचाराधीन श्लोक में किया गया है जिसके द्वारा कोई भी अनासक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। ब्रह