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Gita / Chapter 2.60
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः | इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः

Transliteration

yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ . indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ

English

For, O son of Kunti, the turbulent organs violently snatch away the mind of an intelligent person, even while he is striving diligently.

Hindi

हे कौन्तेय (संयम का) प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान (विपश्चित) पुरुष के भी मन को ये इन्द्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।।

Sanskrit
English
यततः
of the striving
हि
indeed
अपि
even
कौन्तेय
O Kaunteya (son of Kunti)
पुरुषस्य
of man
विपश्चितः (of
the) wise
इन्द्रियाणि
the senses
प्रमाथीनि
turbulent
हरन्ति
carry away
प्रसभम्
violently
मनः
the mind.
Hindi

अब तक के अपने प्रवचन में भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञानी पुरुष के इन्द्रिय संयम की सार्मथ्य पर विशेष बल दिया है। भारत में दर्शनशास्त्र के सिद्धान्तों को अव्यावहारिक होने पर स्वीकारा नहीं जाता। अत गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को उन साधनों का भी उपदेश देते हैं जिनके अभ्यास से वह भी स्थितप्रज्ञ के पूर्णत्व को प्राप्त कर सकता है।सत्त्व (विवेकशीलता) रज (क्रियाशीलता ) और तम (निष्क्रियता) इन तीन गुणों का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति के अन्तकरण पर पड़ता है। तमोगुण के आवरण तथा रजोगुण के विक्षेप के कारण जब सत