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Gita / Chapter 7.21
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति | तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्

Transliteration

yo yo yāṃ yāṃ tanuṃ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati . tasya tasyācalāṃ śraddhāṃ tāmeva vidadhāmyaham

English

Whichever form (of a deity) any devotee wants to worship with faith, that very firm faith of his I strengthen.

Hindi

जो-जो (सकामी) भक्त जिस-जिस (देवता के) रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस (भक्त) की मैं उस ही देवता के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।।

Sanskrit
English
यः
who
यः
who
याम्
which
याम्
which
तनुम्
form
भक्तः
devotee
श्रद्धया
with faith
अर्चितुम्
to worship
इच्छति
desires
तस्य तस्य
of him
अचलाम्
unflinching
श्रद्धाम्
faith
ताम्
that
एव
surely
विदधामि
make
अहम्
I.
Hindi

इस अध्याय के प्रारम्भिक भाग में ही आत्मानात्म विवेक (जड़चेतन का विभाजन) करके भगवान् श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है कि किस प्रकार उनमें समस्त नामरूप पिरोये हुए हैं। उसके पश्चात् उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार त्रिगुणात्मिका मायाजनित विकारों से मोहित होकर मनुष्य अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को नहीं पहचान पाता। आत्मचैतन्य के बिना शरीर मन और बुद्धि की जड़ उपाधियाँ स्वयं कार्य नहीं कर सकती हैं।जगत् में देखा जाता है कि सभी भक्तजन एक ही रूप में ईश्वर की आराधना नहीं करते। प्रत्येक भक्त अपने इष्ट देवता