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Gita / Chapter 6.1
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

श्रीभगवानुवाच | अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः | स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः

Transliteration

śrībhagavānuvāca . anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ . sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ

English

The Blessed Lord said He who performs an action which is his duty, without depending on the result of action, he is a monk and a yogi; (but) not (so in) he who does not keep a fire and is actionless.

Hindi

श्रीभगवान् ने कहा — जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है।।

Sanskrit
English
अनाश्रितः
not depending (on)
कर्मफलम्
fruit of action
कार्यम्
bounden
कर्म
duty
करोति
performs
यः
who
सः
he
संन्यासी
Sannyasi (ascetic)
च
and
योगी
Yogi
च
and
न
not
निरग्निः
without fire
न
not
च
and
अक्रियः
without action.
Hindi

प्रथम अध्याय में अर्जुन का विचार युद्धभूमि से पलायन करके संन्यास जीवन व्यतीत करने का था। उसे यह नहीं ज्ञात था कि निस्वार्थ भाव से कर्म करने वाला कर्मयोगी पुरुष ही सबसे बड़ा संन्यासी है। स्वार्थ का त्याग किये बिना कर्म का आचरण अथवा उससे पलायन करने का अर्थ है विश्व के सामंजस्य में अनर्थकारी हस्तक्षेप करना।मन की अपरिपक्व स्थिति में जीवन संघर्ष से पलायन करके गंगा के किनारे शान्त वातावरण में ध्यानाभ्यास के लिए जाने से सामान्य स्तर के अच्छे मनुष्य का भी गंगा में पड़े पाषाण के स्तर तक पतन होगा