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Gita / Chapter 4.31
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् | नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम

Transliteration

yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam . nāyaṃ loko.astyayajñasya kuto.anyaḥ kurusattama

English

Those who partake of the nectar left over after a sacrifice, reach the eternal Brahman. This world ceases to exist for one who does not perform sacrifices. What to speak of the other (world), O best among the Kurus (Arjuna)!

Hindi

हे कुरुश्रेष्ठ ! यज्ञ के अवशिष्ट अमृत को भोगने वाले पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ रहित पुरुष को यह लोक भी नहीं मिलता,  फिर परलोक कैसे मिलेगा?

Sanskrit
English
यज्ञशिष्टामृतभुजः
eaters of the nectar — the remnants of the sacrifice
यान्ति
go
ब्रह्म
Brahman
सनातनम्
eternal
न
not
अयम्
this
लोकः
world
अस्ति
is
अयज्ञस्य
of the nonsacrificer
कुतः
how
अन्यः
other
कुरुसत्तम
O best of the Kurus.
Hindi

प्राचीनकाल में यज्ञकर्म में अग्नि की आहुति देने के पश्चात् जो कुछ अवशिष्ट रह जाता था उसे ही अमृत कहते थे जिसका सेवन भक्तगण ईश्वर का प्रसाद समझकर करते थे। उनका यह विश्वास था कि भक्तिपूर्वक इस अमृतसेवन से अन्तकरण की शुद्धि हो सकती है।इस रूपक के आध्यात्मिक लक्ष्यार्थ पर विचार करने पर ज्ञात होगा कि अवशिष्ट अमृत का अभिप्राय उपर्युक्त यज्ञों के आचरण से प्राप्त फल से है। इन यज्ञों के आचरण का फल है आत्मसंयम अथवा दूसरे शब्दों में संगठित व्यक्तित्व। इस फल को प्राप्त पुरुष ही ध्यानाभ्यास के योग्