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Gita / Chapter 4.12
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः | क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा

Transliteration

kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ . kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhirbhavati karmajā

English

Longing for the fruition of actions (of their rites and duties), they worship the gods here. For, in the human world, success from action comes ickly.

Hindi

(सामान्य मनुष्य) यहाँ (इस लोक में) कर्मों के फल को चाहते हुये देवताओं को पूजते हैं;  क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों के फल शीघ्र ही प्राप्त होते हैं।।

Sanskrit
English
काङ्क्षन्तः
those who long for
कर्मणाम्
of actions
सिद्धिम्
success
यजन्ते
sacrifice
इह
in this world
देवताः
gods
क्षिप्रम्
ickly
हि
because
मानुषे
in the human
लोके (in
the) world
सिद्धिः
success
भवति
is attained
कर्मजा
born of action.
Hindi

सुकर्म अथवा दुष्कर्म करने के लिये आत्म चैतन्य अथवा ईश्वर की शक्ति की समान रूप से आवश्यकता है और वह उपलब्ध भी है। परन्तु मन की प्रवृत्ति बहिर्मुखी ही बनी रहने के कारण है इन्द्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क होने पर निम्न स्तर के सुख की संवेदनाओं में उसकी आसक्ति। इस प्रकार के सुख सरलता से प्राप्त भी हो जाते हैं।अनेक प्रयत्नों के बावजूद हम वैषयिक सुख में ही रमते हैं जिसका कारण भगवान् बताते हैं मनुष्य लोक में कर्म की सिद्धि शीघ्र ही होती है।इस जगत् में विषयोपभोग के द्वारा सुख पाना सामान्य मन