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Gita / Chapter 2.55
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

श्रीभगवानुवाच | प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् | आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते

Transliteration

śrībhagavānuvāca . prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān . ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate

English

The Blessed said O Partha, when one fully renounces all the desires that have entered the mind, and remains satisfied in the Self alone by the Self, then he is called a man of steady wisdom.

Hindi

श्री भगवान् ने कहा — हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है? उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

Sanskrit
English
प्रजहाति
casts off
यदा
when
कामान्
desires
सर्वान्
all
पार्थ
O Partha
मनोगतान्
of the mind
आत्मनि
in the Self
एव
only
आत्मना
by the Self
तुष्टः
satisfied
स्थितप्रज्ञः
of steady wisdom
तदा
then
उच्यते (he)
is called.
Hindi

आत्मानुभवी पुरुष के आन्तरिक और बाह्य जीवन का वर्णन कर भेड़ की खाल में छिपे भालुओं के समान पाखण्डी गुरुओं से भिन्न सच्चे गुरु को पहचानने में गीता हमारी सहायता करती है। इसके अतिरिक्त यह प्रकरण साधकों के लिये विशेष महत्त्व का है क्योंकि इसमें आत्मानुभूति के लिये आवश्यक जीवन मूल्यों एवं विभिन्न परिस्थितियों में मन की स्थिति कैसी होनी चाहिये इसका विस्तार से वर्णन है।इस विषय के प्रारम्भिक श्लोक में ही ज्ञानी पुरुष की आन्तरिक मनस्थिति के वे समस्त लक्षण वर्णित हैं जिन्हे हमको जानना चाहिये। उपन