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Gita / Chapter 18.46
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् | स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः

Transliteration

yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam . svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṃ vindati mānavaḥ

English

A human being achieves success by adoring through his own duties Him from whom is the origin of creatures, and by whom is all this pervaded.

Hindi

जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।

Sanskrit
English
यतः
from whom
प्रवृत्तिः (is)
the evolution
भूतानाम्
of beings
येन
by whom
सर्वम्
all
इदम्
this
ततम्
is pervaded
स्वकर्मणा
with his own duty
तम्
Him
अभ्यर्च्य
worshipping
सिद्धिम्
perfection
विन्दति
attains
मानवः
man.
Hindi

जब मनुष्य अपने स्वभाव (वर्ण) तथा स्वधर्म (आश्रम? जैसे ब्रह्मचर्य? गृहस्थ आदि) के अनुसार कर्म करता है तब उसकी पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय होता जाता है। यह वासना निवृत्ति तथा इसके फलस्वरूप प्राप्त होने वाली चित्त की शुद्धि और शान्ति तभी संभव होती है? जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वरार्पण की भावना से कर्म करना सीख लेता है।लौकिक कर्तव्यों में यह नियम देखा जाता है कि जिस स्रोत से हमें कार्य करने की शक्ति और फल प्राप्ति होती है? उसके प्रीत्यर्थ कर्म करना हमारा कर्तव्य समझा जाता है। उदा