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Gita / Chapter 18.21
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् | वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्

Transliteration

pṛthaktvena tu yajjñānaṃ nānābhāvānpṛthagvidhān . vetti sarveṣu bhūteṣu tajjñānaṃ viddhi rājasam

English

But know that knowledge to be originating from rajas which, amidst all things, apprehends the different entities of various kinds as distinct [As possessing distinct selves.].

Hindi

जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त भूतों में नाना भावों को पृथक्-पृथक् जानता है, उस ज्ञान को तुम राजस जानो।।

Sanskrit
English
पृथक्त्वेन
as different from one another
तु
but
यत्
which
ज्ञानम्
knowledge
नानाभावान्
various entities
पृथग्विधान्
of distinct kinds
वेत्ति
knows
सर्वेषु (in)
all
भूतेषु
in beings
तत्
that
ज्ञानम्
knowledge
विद्धि
know
राजसम्
Rajasic.
Hindi

जब हम इन्द्रिय? मन और बुद्धि के माध्यम से जगत् का अवलोकन करते हैं? तब? निसन्देह उसमें हमें असंख्य प्रकार के भेद दृष्टिगोचर होते हैं। परन्तु जो वस्तु जिस रूप में दिखाई देती है? उसके उसी रूप को सत्य समझ लेना अविवेक का लक्षण है। राजसी पुरुष का मन सदैव चंचल और अस्थिर रहने के कारण वह कभी शान्त मन से विचार नहीं कर पाता और यही कारण है कि वह दृष्टिगोचर भेद? जैसे वनस्पति? पशु? मनुष्य आदि को परस्पर सर्वथा भिन्न और सत्य मान लेता है। ऐसे ज्ञान को राजस ज्ञान कहते हैं।