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Gita / Chapter 15.4
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः | तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये | यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी

Transliteration

tataḥ padaṃ tatparimārgitavyaṃ yasmingatā na nivartanti bhūyaḥ . tameva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye . yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī

English

Thereafter, that State has to be sought for, going where they do not return again: I take refuge in that Primeval Person Himself, from whom has ensued the eternal Manifestation.

Hindi

(तदुपरान्त) उस पद का अन्वेषण करना चाहिए जिसको प्राप्त हुए पुरुष पुन: संसार में नहीं लौटते हैं। “मैं उस आदि पुरुष की शरण हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है”।।

Sanskrit
English
ततः
then
पदम्
goal
तत्
That
परिमार्गितव्यम्
should be sought for
यस्मिन्
whither
गताः
gone
न
not
निवर्तन्ति
return
भूयः
again
तम्
that
एव
even
च
and
आद्यम्
primeval
पुरुषम्
Purusha
प्रपद्ये
I seek refuge
यतः
whence
प्रवृत्तिः
activity or energy
प्रसृता
streamed forth
पुराणी
ancient.
Hindi

कहीं ऐसा न हो कि कोई विद्यार्थी इस रूपक के वास्तविक अभिप्राय को न समझकर उसे कोई लौकिक वृक्ष ही समझ लें? गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसा वर्णन किया गया है? वैसा वृक्ष यहाँ उपलब्ध नहीं होता। पूर्व श्लोक में वर्णित अश्वत्थ वृक्ष इस व्यक्त हुए सम्पूर्ण जगत् का प्रतीक है। सूक्ष्म चैतन्य आत्मा विविध रूपों और विभिन्न स्तरों पर विविधत व्यक्त होता है जैसे शरीर? मन और बुद्धि में क्रमश विषय? भावनाओं और विचारों के प्रकाशक के रूप में और कारण शरीर में वह अज्ञान को प्रकाशित करता है। आत्मअ