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Gita / Chapter 15.16
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च | क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते

Transliteration

dvāvimau puruṣau loke kṣaraścākṣara eva ca . kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho.akṣara ucyate

English

There are these two persons in the world-the mutable and the immutable. The mutable consists of all things; the one existing as Maya is called the immutable.

Hindi

इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और ‘कूटस्थ’ अक्षर कहलाता है।।

Sanskrit
English
द्वौ
two
इमौ
these
पुरुषौ
Purushas (beings)
लोके
in the world
क्षरः
the perishable
च
and
अक्षरः
the imperishable
एव
even
च
and
क्षरः
the perishable
सर्वाणि
all
भूतानि
beings
कूटस्थः
the immutable (unchanging)
अक्षरः
the imperishable
उच्यते
is called.
Hindi

इस अध्याय के अब तक किये गये विवेचन से सिद्ध हो जाता है कि जिसे पूर्व के त्रयोदश अध्याय में क्षेत्र कहा गया था वह वस्तुत परमात्मा से भिन्न वस्तु नहीं है।जब वह परमात्मा सूर्य का प्रकाश और ताप? चन्द्रमा का शीतल प्रकाश? पृथ्वी की उर्वरा शक्ति? मनुष्य में ज्ञान? समृति और विस्मृति की क्षमता आदि के रूप में व्यक्त होता है? वस्तुत तब ये सब परमात्मस्वरूप ही सिद्ध होते हैं। परन्तु? इस प्रकार अभिव्यक्त होने में अन्तर केवल इतना होता है कि परमात्मा क्षेत्र के रूप में ऐसा प्रतीत होता है? मानो वह विका