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Gita / Chapter 14.12
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा | रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ

Transliteration

lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā . rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha

English

O best of the Bharata dynasty, when rajas becomes predominant, these come into being: avarice, movement, undertaking of actions, unrest and hankering.

Hindi

हे भरत-श्रेष्ठ ! रजोगुण के प्रवृद्ध होने पर लोभ, प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ, शम का अभाव तथा स्पृहा, ये सब उत्पन्न होते हैं।।

Sanskrit
English
लोभः
greed
प्रवृत्तिः
activity
आरम्भः
the undertaking
कर्मणाम्
of actions
अशमः
restlessness
स्पृहा
longing
रजसि
in Rajas
एतानि
these
जायन्ते
arise
विवृद्धे
having become predominant
भरतर्षभ
O best of the Bharatas (or O Lord of the Bharatas).
Hindi

भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ रजोगुण के मुख्य लक्षणों की गणना करते हैं। जिस क्रम में उनका उल्लेख किया गया है? उसमें हम यह देखते हैं कि उत्तरोत्तर लक्षण पूर्व के लक्षण से उत्पन्न होता है। परद्रव्य की इच्छा का नाम है लोभ जो कभी सन्तुष्ट नहीं होता। लोभी पुरुष में आ जाती है प्रवृत्ति अर्थात् फिर वह क्रियाशील हो जाता है? शान्त नहीं बैठ सकता। लोभाधिक्य होने पर उसके किये गये कर्म स्वार्थपूर्वक ही होते हैं? जिनका निर्देश यहाँ कर्मों का आरम्भ इस शब्द से किया गया है। स्वार्थ और लोभ के वशीभूत पुरुष को शम