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Gita / Chapter 12.15
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Sanskrit
Hindi
Sanskrit

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः | हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः

Transliteration

yasmānnodvijate loko lokānnodvijate ca yaḥ . harṣāmarṣabhayodvegairmukto yaḥ sa ca me priyaḥ

English

He, too, owing to whom the world is not disturbed, and who is not disturbed by the world, who is free from joy, impatience, fear and anxiety, is dear to Me.

Hindi

जिससे कोई लोक (अर्थात् जीव, व्यक्ति) उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी व्यक्ति से उद्वेग अनुभव नहीं करता तथा जो हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता) भय और उद्वेगों से मुक्त है,वह भक्त मुझे प्रिय है।।

Sanskrit
English
यस्मात्
for whom
न
not
उद्विजते
is agitated
लोकः
the world
लोकात्
from the world
न
not
उद्विजते
is agitated
च
and
यः
who
हर्षामर्षभयोद्वेगैः
by (from) joy
fear
and anxiety
मुक्तः
freed
यः
who
सः
he
च
and
मे
to Me
प्रियः
dear.
Hindi

इस प्रकरण के द्वितीय भागरूप श्लोक में ज्ञानी भक्त के तीन और लक्षण बताये गये हैं। जिस पुरुष से इस लोक को उद्वेग नहीं होता ज्ञानी पुरुष वह है? जो लोक में किसी प्रकार का विक्षेप या उद्वेग उत्पन्न नहीं करता है। जहाँ सूर्य है वहाँ अन्धकार नहीं रह सकता वैसे ही? जहाँ शान्त और आनन्दस्वरूप में स्थित ज्ञानी भक्त होगा? वहाँ अशान्ति और उदासी का प्रश्न ही नहीं उठता है। उसके आसपास शान्ति? प्रेम और आनन्द का ही ऐसा वातावरण निर्मित होता है कि वहाँ पहुँचने पर एक क्षुब्ध और दुखी पुरुष भी उस महात्मा पुरु