Adiyogi Arts
ServicesResearchBlogVideosGitaPrayersEnter App
Gita / Chapter 11.47
← PrevNext →
Sanskrit
Hindi
Sanskrit

श्रीभगवानुवाच | मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् | तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्

Transliteration

śrībhagavānuvāca . mayā prasannena tavārjunedaṃ rūpaṃ paraṃ darśitamātmayogāt . tejomayaṃ viśvamanantamādyaṃ yanme tvadanyena na dṛṣṭapūrvam

English

The Blessed Lord said Out of grace, O Arjuna, this supreme, radiant, Cosmic, infinite, primeval form-which (form) of Mine has not been seen before by anyone other than you, has been shown to you by Me through the power of My own Yoga.

Hindi

हे अर्जुन! तुम पर प्रसन्न होकर मैंने अपनी योगशक्ति (आत्मयोगात्) के प्रभाव से यह अपना परम तेजोमय, सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दर्शाया है, जिसे तुम्हारे पूर्व किसी ने नहीं देखा है।।

Sanskrit
English
मया
by Me
प्रसन्नेन
gracious
तव
to thee
अर्जुन
O Arjuna
इदम्
this
रूपम्
form
परम्
supreme
दर्शितम्
has been shown
आत्मयोगात्
by My own Yogic power
तेजोमयम्
full of splendour
विश्वम्
universal
अनन्तम्
endless
आद्यम्
primeval
यत्
which
मे
of Me
त्वत्
from thee
अन्येन
by another
न
not
दृष्टपूर्वम्
seen before.
Hindi

स्वयं भगवान् यहाँ स्वीकार करते हैं कि उनके विश्वरूप का दर्शन कर पाना कोई सभी भक्तों का विशेषाधिकार नहीं है। असीम कृपा के सागर भगवान् श्रीकृष्ण के विशेष अनुग्रह के रूप में अर्जुन इस विरले लाभ का आनन्द अनुभव कर सका है। वे यह भी विशेष रूप से कहते हैं कि? यह मेरा तेजोमय अनन्त विश्वरूप तुम्हारे पूर्व किसी ने नहीं देखा है।इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि गीता के रचियता महर्षि व्यास? यहाँ किसी नये दर्शन की स्थापना और व्याख्या कर रहे हैं? जिसकी सत्यता वे भगवान् से प्रमाणित कराना चाहते है। इस क